Eh Adbhut Ehasaas Fatehpur Sikri Ki Yatra (In Hindi)

Eh Adbhut Ehasaas Fatehpur Sikri Ki Yatra in Hindi

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मार्च का महीना था और सुहाना मौसम; न सर्दी और ना ज्यादा गर्मी; हम अपने पूरे परिवार के साथ घूमने निकल पड़े, दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारत को देखने, पर रेलवे स्टेशन जा कर ही समझ आ गया की ये सफ़र नहीं है आसान, क्यूंकि ट्रेन दो घंटे लेट थी। हां पर उस टाइम को भी हमने खूब एन्जॉय किया। सुबह 5 या 6 बजे के आसपास हम हमारी मंजिल पर पहुंचे। सारी रात ट्रेन में सफ़र करके हम लोग थक चुके थे और साथ ही साथ वो जगह हम लोगो के लिए बिलकुल अनजान थी । हम लोगो ने एक गाइड से बात की उसने हमारा सारे दिन का प्रोग्राम ऐसे बना दिया जैसे की उसे पता था की हम आने वाले है । एक-एक मिनट का ख्याल था उसे किस जगह कितनी देर रुकना है, कहाँ खाना खाना है और कब वापस लौट कर आना है ।

हम लोग पहले फ़तेहपुर सीकरी देखना चाहते थे, तो बस हम लोग निकल पड़े अपनी मंजिल की ओर, रास्ता ज्यादा लम्बा तो नहीं, पर फिर भी लगभग 37 किलोमीटर के आस-पास था और जब परिवार का साथ हो तो हर मुश्किल राह भी आसान हो जाती है। सारे रास्ते खूब मज़ा किया फिर जब सीकरी आया, तो वहां मुग़ल काल का वैभव देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध सा दिखाई दे पड़ रहा था ।

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हमारा  गाइड जो ऐसे तो कम बोलता था पर उसे हर जगह के इतिहास की खूब जानकारी थी उसने हमे बताया की फ़तेहपुर सीकरी की स्थापना 16 वी सदी में अकबर बादशाह ने करवाई थी, क्यूंकि यहीं संत सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से उनके यहाँ पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी और अकबर ने ही इस शहर को फ़तेहपुर नाम दिया जिसका मतलब है विजय का शहर।

fatehpur sikri qila fort photo

Copyrighted © www.isrgrajan.com — Beautiful Photo of Fatehpur Sikri Dargah, Agra

फ़तेहपुर सीकरी की इमारतो में मुग़ल काल की शानो-शौकत और विलासिता की स्पष्ट झलक नज़र आती है। यहाँ की इमारते मुग़ल पारसी और हिन्दू सभ्यता की विशेषताओं को इंगित करती हैं। खैर ये सब बाते तो होती ही रहेंगी, अब हम अपनी बात पर आते हैं , जब हम सीकरी पहुंचे तो गेट से अन्दर जाते ही एक छोटा सा बाज़ार नज़र आया, जहाँ हस्तशिल्प का सामान मिल रहा था। छोटे पर सुन्दर ताज महल की प्रितिक्रिति, खूबसूरत छाते, चप्पल और कपडे सब कुछ वहा मौजूद था। बस आपको मोल-भाव की थोड़ी समझ हो, तो आप उचित दाम पर अच्छी खरीदारी कर सकते हैं। मैंने भी वहां से कुछ शौपिंग की फिर हम लोग आगे चले, तो वहा हमे एक बस मिली जो हमे महल के अन्दर तक छोड़ने वाली थी, क्यूंकि टैक्सी स्टैंड महल से काफी दूर था और ये हमारे लिए एक अच्छा अनुभव भी था। कई देशी और विदेशी पर्यटक वहां मौजूद थे, जिससे हमे और भी बहुत मज़ा आया।

एक फ्रांसिसी दम्पति ने बस में चढ़ते ही हमें नमस्ते किया, तो हम लोग चौंक गये, फिर रास्ते में उनसे बात हुई, तो पता चला की वो लोग अपना हनीमून मनाने आये हैं। उस दिन समझ आया की अगर आप किसी को जानना चाहते हैं, तो भाषा कभी भी बाधा नहीं बन सकती। महल पर पहुंचे, तो गेट पर ही एक औरत बांस के झुनझुने बनाकर बेच रही थी।उसके हाथो की सधी हुई कारीगरी देखने लायक थी। हमने भी अपने बच्चों के लिए कुछ झुनझुने खरीदे और महल में गये, महल काफी बड़ा और आलिशान है और यहाँ की सारी इमारते दीवाने खास ,पञ्च महल, दौलत खाना इ ख़ास , जोधा बाई की रसोई, जोधा बाई का महल आदि अपने आप में कई कहानियाँ समाये हुए है।

दीवाने खास के सामने आज भी ऐसा लगता है, जैसे बादशाह अकबर अपना दरबार लगाए लोगों की परेशानियां सुनने के लिए मौजूद हैं और महल इतना बड़ा और खूबसूरत है कि आप अगर हर इमारत को पूरा देखना चाहें, तो पूरा दिन भी कम पड़ जाये।

Family at Fatehpur Sikri Dargah

Copyrighted © www.isrgrajan.com — Family at Fatehpur Sikri Dargah, Uttar Pradesh

खैर हमारे पास इतना वक़्त तो नहीं था, पर फिर भी हम उस महल की खूबसुरती को आँखों में बसा कर सलीम चिश्ती की दरगाह की और चले पड़े। दरगाह पर अत्यंत भीड़ थी, उसके बावजूद हम वहां किसी न किसी तरह पहुँच ही गए। दरगाह पर विदेशी मेहमानों को पहनें के लिए एक चादर दी जाती हैं क्यूंकि दरगाह पर खुले सर जाना ठीक नहीं माना जाता। ये हमारी श्रधा है और विदेशी भी इसका सम्मान करते हैं। दरगाह पर इतनी भीड़ के बाद भी अजीब सुकून और शांति थी, उस जगह कव्वाल लोग अपने सूफिया कलाम से लोगो को रूहानियत का एहसास करा रहे थे। सलीम चिश्ती की दरगाह एक बहुत ही खूबसूरत इमारत है, जो की सफ़ेद संगमरमर की बनी हुई है ।

वहाँ मुग़ल खानदान के कई और लोगों  की कब्रे भी मौजूद है। दरगाह पर चादर चढ़ा कर हम लोग बहार निकले, तो एक ईरानी महिला ने हम लोगो के साथ फोटो खिंचवाने की गुज़ारिश की, उस वक़्त उस के चेहरे पर बिलकुल वैसे ही ख़ुशी थी जैसे अक्सर हम हिन्दुस्तानी किसी विदेशी के साथ फोटो खिंचवाकर महसूस करते हैं।

अरे एक ख़ास बात तो रह ही गई, वहां दरगाह पर 8-10  साल के कई छोटे बच्चे घूम रहे थे, जो हमसे उनकी शायरी सुनने की गुज़ारिश कर रहे थे, वो भी 10 रुपये में। हमने सोचा कि चलो देखे भाई आखिर 10 रुपये में ये कौन-सा शेर सुनाने वाले हैं? क्या सुनाया वो तो कुछ समझ नही आया, बस एक लाइन थी जो बहुत कोशिश के बाद समझ में आई, “मैडम हमारी चाँद से प्यारी” हां-हां, है न 10 रुपये में अपनी तारीफ़ सुनने का नायाब नुश्खा।

हमने बुलंद दरवाज़े के पास देखा कि कुछ छोटे-छोटे दुकानदार टोपी और कुछ छोटे मोटे सामान रख कर बेच रहे थे, तो कुछ ककड़ी पर नमक मिर्च लगा कर, तो कुछ समोसे आदि। उस छोटी से जगह में ऐसा लग रहा था, मानो वहां सब कुछ मौजूद था। पर हाँ, बुलंद दरवाज़ा जो सच मुच बुलंद था। नज़रे उठा के देखो, तो मुग़ल काल की विजय गाथा को अपने आप में ब्यान करता हुआ सर उठाये खड़ा है; 54 मीटर ऊँचा दरवाज़ा, जो दुनिया की प्रमुख इमारतो में  शामिल है।

बुलंद दरवाजा देखने के बाद लोगों को अगरा के लिए भी निकलना था, तो हम लोग उस  खूबसूरत जगह से विदा लेकर वापस टैक्सी स्टैंड पर आ गये, जहाँ हमारा टैक्सी ड्राईवर पहले से ही हमारा इंतज़ार कर रहा था।

अपनी इस यात्रा में हमने कई रोमांचक मोड़ देखें और ये समझ आया कि किसी जगह की खूबसूरती को सिर्फ फोटो में क़ैद नही किया जा सकता। ज़रूरी है की हम उस जगह को महसूस करें क्यूंकि हर पुराना महल अपने अन्दर एक कहानी छुपाए होता है।

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