इस नववर्ष पर खुद को दें नए और बेहतर समाज का तोहफा

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वक़्त अपने रफ़्तार से प्रगति पथ पर अग्रसर है। तारीखें बदलती जाती हैं,सप्ताह बदलते जाते हैं, फिर माह,फिर मौसम और साल भी बदल जाते हैं।इसी कड़ी में वर्ष 2016 को विदा करने और वर्ष 2017 के आगाज़ का वक़्त भी आ गया।नववर्ष के खुशियों में चार-चाँद लगाने के लिए उपहारों की बात करते हैं।आइए इस बार अपने समाज को उपहार दें।थोड़ा स्वार्थ करते हैं और नववर्ष का तोहफा समाज को ना देकर खुद को एक बेहतर खुद का तोहफा देते हैं।ज़ाहिर-सी बात है कि व्यक्ति ही समाज का मूल ईकाई है।ऐसे में ये अनमोल तोहफा परोक्ष रूप से समाज को ही जाएगा।

यहाँ बात हो रही है हमारे आसपास के अभावों को पूरा करने की,हमारे आदतों के खामियों को मिटाने की और एक स्वस्थ और हर मायने में बेहतर समाज के निर्माण की।चलो माना कि अधिकतर मनुष्य स्वार्थी होता है,तो कम-से-कम अपने स्वार्थ की खातिर खुद को एक नए और बेहतर समाज का तोहफा तो दे ही सकता है।वो भी जब नववर्ष का हर्षित अवसर हो।

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उपरोक्त आकांक्षाओ को पूरा करने के लिए कुछ खास पहलुओं पर नज़र डालते हैं-

1. घर नहीं, ‘गाँव-घर’ को रखें साफ

स्वास्थ्य को सबसे महत्वपूर्ण धन माना जाता है।इसके लिए ज़रूरी तत्व है सफाई ।हम जिस गाँव या मोहल्ले में रहते हैं, उस पूरे क्षेत्र को अपने घर की तरह मानते हैं, इसलिए पूरे क्षेत्र को अपना ‘गाँव-घर’ कहकर संबोधित करते हैं।स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ घर नहीँ, ‘गाँव-घर’ यानी आसपास के क्षेत्रों का साफ रहना भी ज़रुरी है।

‘यहाँ सफाई को लेकर सरकार की व्यवस्था लचीली है।’ ऐसे वाक्य कई लोगों के विचारों में शामिल मिलेंगे।पर इस मसले पर मेरे विचार थोड़े भिन्न हैं।हम खुद को और अपने आसपास के इलाके को साफ रखते हैं या नहीं ?ये तो हमारी खुद की मानसिकता पर निर्भर करता है।ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब-जब किसी सार्वजनिक कूड़ेदान के आसपास के जमीन पर कचरे का अंबार बिखरा पड़ा देखता हूँ, तो मन में एक सवाल तो उठता ही है।आखिर ये अंबार कूड़ेदान के बाहर क्यों बिखरा पड़ा है ? इससे पता चलता है कि हमारी मानसिकता में सुधार की ज़रूरत है।हम नतीजों पर ध्यान ना देकर,जाने-अनजाने में अपने स्वास्थ्य के शत्रुओं को न्योता दे रहे हैं।नए साल में नई सोच लाएं और समाज को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाएं।

2. ‘टेक्नोलॉजी’ को सही मायनों में अपनाएं

‘टेक्नोलॉजी’ का इस्तेमाल करने में हम हर प्रकार से दुनिया के सामानांतर चलते नज़र आ रहे हैं।’सोशल नेटवर्किंग साइट्स’ पर भी सक्रिय हैं।फिर भी पूरी तरह ‘मॉडर्न’ नहीं कहे जा रहे।इसके पीछे भी हमारी अविकसित मानसिकता है।आज के ज़माने में भी,जहाँ हमारा भारत ‘कैशलेस’ बनने के जद्दोजहद में लगा है, हम ‘सोशल नेटवर्किंग साइट्स’ पर ऐसे-ऐसे संदेश भेजते हैं-”इस फोटो या संदेश को दस लोगों के पास भेजें नहीँ तो कुछ बुरा होगा।” ये शर्मनाक हरकतें और वक़्त की बर्बादी बंद करते हुए,ये शपथ लेने की आवश्यकता है कि नववर्ष के साथ ही हम विकास के प्रतीक सुविधाओं को अविकसित मानसिकता का शिकार बनाना बंद करेंगे।आज के समय में ये एक ठोस कदम होगा और हम भी दुनिया की रफ़्तार को पकड़ सकेंगे।

3. शिक्षा को प्रायोगिक रूप दें

नववर्ष में एक पहल करें।शिक्षाओं को पुस्तकों के पन्नों से बाहर की दुनिया से रु-ब-रु करायें।शिक्षाओं को प्रायोगिक रूप देना समाज-सुधार के तरफ सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।बिना शिक्षा के तरक्की का ख्वाब,शायद ख्वाब ही रह जाएगा।शिक्षा ही वो पगडंडी है जो उपरोक्त ‘टेक्नोलॉजी’ और स्वास्थ्य के मामलों में सफलता प्राप्ति के साथ-साथ अन्य बुलंदियों तक भी पहुँचाएगी।सिर्फ शिक्षित होने से,शिक्षा को पुस्तकों के पन्नों में बंद कर,वही वक़्त की बर्बादी वाले संदेश भेजने और कूड़ेदान के बाहर कचरा बिखेरते रहने से समाज बेहतर नहीं होने वाला।
ज़रूरत है निरक्षरों को सांक्षर बनाने की,साक्षरों को शिक्षित बनाने की और शिक्षितों के सोच में बदलाओ के अलख को जगाने की।नए साल में नया और बेहतर समाज तो इंतज़ार में है।अपने रोज़ाना के जीवन के तरीकों को बदलना होगा। तो फिर देर कैसी ?इस बार सिर्फ साल नहीं,बल्कि- “साल बदलो,सोच बदलो,समाज बदलो !

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